परम पूज्य गुरु घासीदासजी

छत्तीसगढ़ प्रदेश सतनामी समाज के उत्थान की गाथा है । सर्वप्रथम परम पूज्य गुरु घासीदासजी का प्रादुर्भाव होना और उनके भक्ति एवं उपदेश से जो जनमानस पर असर हुआ उसी के परिणाम स्वरुप जागृत हुआ । आज सतनामी समाज सारे भारत में जागरुक एवं शांति से है जो बाबजी के आदर्श एवं सुधारवादी दृष्टिकोण के कारण है । बाबाजी गुलामी के समय अपनी अलग पहचान बनाकर समाज को जागृत करने में संर्घष किया यह एक अकल्पनीय है । साधन का अभाव, प्रचार एवं आवगमन की सुविधा न होना, शिक्षा का प्रचार न होना, राजा - महाराजाओं की प्रताडना, गुलामी जीवन तथकथ्रित उच्चवर्गो की कटुता जैसे अनेक विसंगतियों के रहते बाबाजी चमत्कारिक पुरुष के रुप उभरे और समाज की बागडोर संभालकर समाज को दिशा दिया यह साधारण बात नहीं है ।
    बाबाजी अपने स्वभाव, आचरण, त्याग, भङ्कित, सेवाभाव जैसे व्यवहार से संत कहाये और जनमानस को सत्‌ और अहिंसा का उपेदश देकर सदगुरु बन गये । आज समाज परम पूज्य गुरु द्घासीदास को गुरु और भगवान मानने लगे है साथ ही सिद्धि हेतु आराध्य देव बना लिए है । बाबाजी के अलौकिक कृति का प्रभाव उच्च वर्गो पर पडा जिससे छत्तीसगढ़ शांत क्षेत्र कहलाया । सारे भारत से कोनेकोने से छत्तीसगढ को शांत क्षेत्र मानकर यहां के रहवासी बन गये । बाबाजी अनुयायियों को खानपान, रहनसहन और आचरण में पूर्ण रुप से परिवर्तन कर अभिमान, अहंकार, ईर्ष्या, द्बेश, लोभ, भय हिंसा आदि मानव के दुर्गुण को दूर कर मेहनत कर, चरित्रवान बनकर, अहिंसा धर्म पालन कर, शांतिप्रिय बनने का पाठ पढाया और सत्‌मार्ग पर चलने को कहा ।
बाबाजी का जीवन ही अनुययियों के लिए आदर्श एवं शिक्षा का कार्य किया । आज भी समाज धैर्यवान, शांतिप्रिय, सत्‌ मागी, मेहनती, मृदुभाषा को छोड़ा नहीं है ।

             बाबाजी गृहस्थ में रहकर त्याग, तपस्या कर संत बने और कमजोर, असहाय, अन्य समाज के द्बारा पीडि त, शोषित को ज्ञन दिया और अपने साथ चलने के लिए प्रेरित किया ताकि समाज को कोई नीचा न कह सके, समाज को शर्म से झुकना न पडे । समाज स्वाभिमान से जीना सीखा है । बाबाजी के ज्ञन और उपदेश को लेकर अनेक समाज सुधारक बने एवं वे सब बाबा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहे । बाबाजी के पुत्रों ने समाज को संगठित कर बाबाजी के मार्ग पर चलने के लिए उत्प्रेरक बने और समाज सभी दिशा में अपनी पहचान बनाने प्रारंभ कर दिये । बाबाजी ने न कोई ग्रंथ लिखा न उनके उपदेश, अमृत वाणियां कंठस्थ है । आज के स्थिति में पढ़े लिखे विद्बानों की कमी नहीं है इसलिए लिपिबद्ध होने में कठिनाई भी नहीं है बाबा गुरु द्घासीदासजी का व्यङ्कितत्व को उभरने के लिए अलग अलग विचार विद्बानों द्बारा कही गयी है फिर भी बाबाजी के क्रिया कलापों का अनदेखा नहीं जा सकता । बाबाजी की प्रेरणा और उपदेश सं समाज स्वाभिमान बना है ।
         बाबाजी के समकालिन संतो का उपदेश निरंक निराकर रहा । मूर्तिपूजा, बलिप्रथा संन्यासी बनना, उपासना, कर्मकांड आदि से बाबजी ने अपने अनुयायियो को दूर रहने को कहा । बाबाजी का मार्ग था वह सत्‌मार्ग है । सतमार्ग आकाश, पृथ्वी, सूरज, हवा अग्रि, जल है । सत्‌ ही जीव जन्तु निर्जिव है । सत्‌ पुरुष ही सत्‌ का ज्ञान प्राप्त कर सकने में समर्थ है वही कारण है बाबाजी सत्‌ के पुजारी बनाकर सत्‌गुरु कहलाये । बाबाजी ने कहा था सत्‌ ही जीवन है, सत्‌ ही मरण है सत्‌ ही करम है ।
         परम पूज्य गुरु द्घासीदासजी के अलौकिक कृतियों के कारण भङ्कतों का आकर्षण होना और सत्‌ का दर्शन हेतु आतुर होना ऊंचे समाज के लोग और राजा महाराजाओं का ङ्कलेश का कारण रहा है। जिसके कारण बाबाजी सुरक्षित स्थान की तलाश में भण्डारपुरी प्रस्थान कर गये । गिरौदपुरी ज्रमस्थली का आकर्षण एवं बाबाजी के कृतियों का यादगार भङ्कतजनों का जमाबाडा होने लगा आर धर्मस्थल की माटी को अपने मस्तक में लगाकर गर्व करने लगे ।

उपदेश

         बाबाजी के जनसाधरण, सामान्य सी लगने वाली ७ उपदेश जन- जन तक आत्मा की आवाज समझ कर ग्रहण की जाने लगी फलस्वरुप बाबाजी के उन उपदेश के कारण सामज की जीने की शैली ही बदल गई । बाबाजी ने कहा- सतनाम को मानों मूर्तिपूजा मत करो, जाति पाति प्रपंथ से दूर रहो, मांसाहारी मत बनो, जीवात्मा पर अत्याचार मत करो, पर स्त्री को माता मानों, शारब, नशा मत लो, अपरान्ह में खेत मत जोतो ।

रावटी

बाबाजी गांव गांव भ्रमण कर उन गांवों में कुछ दिन रहकर वहां के रहवासी से द्घुलमिकर अपना प्रभाव वहां छोड़ जाते थे साथ ही अपनी वाणी से जनमानस को संदेश दे जाते थे । उस संदेश को अमृतवाणी समझ रि जनमानस ग्रहण करने लगे थे जहां जहां भ्रमण किये गये एवं कुछ दिन रुके उसे रावटी के नाम से जाना गया । बाबाजी गृहस्थ रहकर संत थे । बाबाजी के त्याग, तपस्या किसी गृहस्थ से त्याग कर आये संत महापुरुष से कम नहीं थे । यही कारण है बाबाजी जनसाधारण, जनमानस पर सत्‌ को समाहित करने में सफल रहे है । बाबाजी संत की परिभाषा से अपने को दूर रखकर समाज सुधारक एवं समाज समस्या पर जझते रहे और समाज में अपना प्रभाव छोडकर समाज की बुराईयों को दूर करने में अहम भूमिका अदा किये और यही कारण है कि बाबाजी साधारण सा परिवार, अन्य समाज से उपेक्षित समाज से, साधारण सा जीवन शैली से जीने वाले व्यङ्कित का कार्य करते समय उनके अलौकिक कृति के कारण बाबाजी सबके पूज्यनीय रहे है और रहेंगे । बाबाजी के रावटी के समय प्रचारप्रसार के प्रभाव में भी अपने वचनों, उपदेशों, अमृत वाणियों से सत्‌ज्ञन जनमानस को देते रहे उसे जनमानस ग्रहण करते रहे और जनमानस बाबाजी के अनुयायी बनकर शरण लेते रहे। बाबाजी के एक मुश्त लाखों में अनुयायी बनना छत्तीसगढ इसका उदहारण है । बाबाजी के कृति को झुठलाया नहीं जा सकता ।

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