आध्यात्मिक गुरु


बाबाजी आध्यामित्क गुरु थे । अध्ययन से दूर रहकर भी आध्यात्म में काफी आगे रहे । बाबाजी के आध्यात्म को समझने के लिए शोध की आवश्यकता है । बाबाजी तपस्या कर, धुनी रचाकर, एकांतवास का अलौकिक कृति को प्राप्त किया और सत्‌ का दर्शन प्राप्त किया तथा सत्‌ का ज्ञन प्राप्त करने में बाबाजी का नाम आता है । बाबाजी वैराग्य धारण करने हेतु तीर्थ स्थानों का दर्शन करने के लिए जगन्नाथ यात्रा पर निकले थे पर सारंगढ से वापस आ गये और वैराग्य धारण करने की कल्पना त्याग दिये और सत्‌ दर्शन में लग गये ।
         परम पूज्य गुरु द्घासीदासजी का सत्‌ज्ञान पर उनके द्बारा किसे गये कार्यो का अवलोकन करने पर मालूम किया जा सकता है । बाबाजी ने सत्‌ का ज्ञान प्राप्त किया और उस ज्ञन को जनमानस पर प्रवाहित किया, यह एक भावना से जुड़ी रह गई जिसे बाबाजी का ज्ञन प्राप्त हुआ वे उसका उल्लेख नहीं कर पाये । आज बाबाजी के अनुयायी भी सत्‌ज्ञान के उदाहरण सहित बता पाने में असमर्थ है । बाबाजी को सत्‌गुरु कहा गया है । बाबाजी की वाणी से जो शब्द निकले थे उन शब्दों में सत्‌ ज्ञन का आभास होता था जिस तरह से सूरज निकलने के समय सुबह होने का आभास होता है, सूरज डूबने के समय रात्रि का आभास होता है । जल, नभ, हवा, ताप, पृथ्वी इन पांच तत्वों का आभास से जाना जाता है । सूरज के प्रकाश एवं ताप से जाना जाता है । पंच तत्वों के गुणों से परिचय मिल जाता है ये सब सत्‌ को आभास कराता है । बाबाजी ने सत्‌ को जानने के लिए जन साधारण को अमृत वाणी एवं उपदेश से परिचयकराया ।

         इन्ही मेंसूक्ष्मता से अध्ययन करने पर हमें सत्‌ का भाव मालूम हो सकता है । उदाहरण स्वरुप सतनाम घट घट में समाये हे । सतनाम हर धडकन में है, हर श्वांस में है, हर त्रतु में है, हर स्थान में है, यह बाबाजी ने माना है । जहां सत्‌ और सत्‌ को दर्शाता है वह सतनाम कहा गया है । इस तरह कई भक्तगण मानते है । पर्रतु बाबाजी ने सत्‌ को सर्वव्यापी माना है अतः सतनाम भी सर्वव्यापी है।
सत्‌ का ज्ञान प्राप्त, सत्‌ को पहचानना, जानना, सत्‌ में समाहित होना सतनाम है । बाबाजी ने ''सतनाम घट घट में समाये है'' को उद्‌धृत किया उसका अभिप्राय यही है । सतनाम मानने का नहीं है, सतनाम जानने का है । सतनाम एक दिशा है, एक मार्ग, एक रास्ता है, जो सत्‌ ज्ञान प्राप्त किया है वह सतनाम पर टिका है सतनाम एक धूरी है ।
         आजकल सतनाम को एक वर्ग, एक समाज की विशेष पहचान बनाकर जाना जाने लगा है जो निर्मूल है । बाबाजी के अनुसार ''सतनाम घट घट में समाये है की व्याखया व्यापक है, किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं है । सतनाम पूरी सृष्टि के लिए है, मानव, जीव जन्तु के लिए है । ब्रम्हांड जिसमें अनेक सूरज, असंखय ग्रह, उपग्रह विद्यमान है । सूरज का ताप हजारों वर्षों से कम नहीं हो रहा है । सभी ग्रह सूरज के चारों ओर घूम रहे हैं, उनकी गति में कमी नहीं आयी है, यही सत्‌ है और जो सत्‌ का आभास कराता वह सतनाम है इसलिए कहा जाता है सतनाम एक धूरी है जिससे सबको होकर गुजरना है और यह कार्य सत्‌ पर आधारित है सतनाम से जाना जा सकता है । ग्रहों का सूरज के चारों ओर घूमना, चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर घूमना उनकी प्रवृत्ति बन गई है यही सत्‌ है । सत्‌ मिटाया नहीं जा सकता, सत्‌ को झूठलाया नहीं जा सकता, सत्‌ अकाट्‌य है ।
         बाबाजी ने अनेक उपदेश अनेक अमृत वाणियों जनमानस की कुरितियों को दूर करने के लिए कही है । समय की मांग एवं मानव के उत्पीड़न को दूर करने के लिए बाबाजी जन जन में समा गये थे । इसलिये बाबाजी ने जनमानस को सात्विक आचार विचार पैदा करने के लिए उपदेश दिये ।

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